Monday, July 17, 2017

राष्ट्रपति चुनाव के बाद मोदी के हाथ मजबूत होंगे

प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
17 जुलाई 2017
देश की राजनीति के लिहाज़ से सोमवार को दो बड़ी घटनाएं होंगी. पहला दिल्ली में सोलहवीं संसद का चौथा मॉनसून सत्र शुरू होगा, और दूसरा दिल्ली और देश के सभी राज्यों की राजधानियों में देश के चौदहवें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे. 

ऐसे में सहज जिज्ञासा होती है कि इस चुनाव का औपचारिकता से ज़्यादा कोई मतलब भी है या नहीं? लगता है कि बीजेपी गठबंधन के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद यह चुनाव जीत जाएंगे. 

सवाल है कि नए राष्ट्रपति के आगमन से बीजेपी गठबंधन सरकार की स्थिति में क्या बदलाव आएगा? क्या मोदी सरकार की स्थिति बेहतर हो जाएगी?

प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक थे. उनके कार्यकाल में भी मोदी सरकार को कभी परेशानी नहीं हुई. 

हाल में नरेंद्र मोदी ने उन्हें कृतज्ञता में पिता-तुल्य माना और कहा, 'मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि मुझे प्रणब दा की उँगली पकड़ कर दिल्ली की ज़िंदगी में ख़ुद को स्थापित करने का मौका मिला.'

राष्ट्रपति का चुनाव हालांकि राजनीतिक गतिविधि है, पर उसके नाटकीय निहितार्थ नहीं होते. ज़्यादा से ज़्यादा सत्तारूढ़ दल के रसूख का पता लगता है. आमतौर पर उसके नतीजों का पहले से अनुमान होता है.

इस पद की संवैधानिक भूमिका भी काफी हद तक औपचारिक है. कहते हैं कि वह केवल 'रबर स्टांप' है. पर बदलते राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह भूमिका कुछ ख़ास मौकों पर महत्वपूर्ण भी हो सकती है.

नए दौर में प्रवेश करती भारतीय राजनीति

राजनीतिक गलियारों में डेढ़-दो महीने की अपेक्षाकृत चुप्पी के बाद आज दो बड़ी राजनीतिक घटनाएं होने जा रहीं हैं, जिनका राजनीति पर असर देखने को मिलेगा. देश के चौदहवें राष्ट्रपति के चुनाव के अलावा संसद का मॉनसून सत्र आज शुरू हो रहा है. सोलहवीं लोकसभा के तीन साल गुजर जाने के बाद यह पहला मौका है, जब 18 विरोधी दल एक सामूहिक रणनीति के साथ संसद में उतर रहे हैं. पिछले मंगलवार को इन दलों ने उप-राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी का नाम तय करने के साथ अपनी भावी रणनीति का खाका भी तय किया है. ये दल अब महीने में कम से कम एक बार बैठक करेंगे. ये बैठकें दिल्ली में ही नहीं अलग-अलग राज्यों में होंगी. ज्यादा महत्वपूर्ण है संसदीय गतिविधियों में इनका समन्वय. राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया अब क्रमशः तेज होगी.

Sunday, July 16, 2017

काजल की कोठरी क्यों बनी राजनीति?

एक सामान्य कारोबारी को लखपति से करोड़पति बनने में दस साल लगते हैं, पर आप राजनीति में हों तो यह चमत्कार इससे भी कम समय में संभव है। वह भी बगैर किसी कारोबार में हाथ लगाए। बीजेपी के नेता सुशील कुमार मोदी का दावा है कि लालू प्रसाद का परिवार 2000 करोड़ रुपये की संपत्ति का मालिक है। इस दावे को अतिरंजित मान लें, पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनकी मिल्कियत करोड़ों में है। कई शहरों में उनके परिवार के नाम लिखी अचल संपत्ति के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है। 

Saturday, July 15, 2017

राजनीति नहीं चाहती सीबीआई को स्वतंत्र बनाना

इस साल मई में लालू यादव के पारिवारिक ठिकानों पर जब सीबीआई की छापा-मारी हुई तो लालू यादव ने ट्वीट किया,बीजेपी में हिम्मत नहीं कि लालू की आवाज को दबा सकेलालू की आवाज दबाएंगे तो देशभर में करोड़ों लालू खड़े हो जाएंगे। यह राजनीतिक बयान था। उन छापों के बाद यह भी समझ में आने लगा कि लालू और नीतीश कुमार के बीच खलिश काफी बढ़ चुकी है। छापों की खबर आते ही लालू ने अपने ट्वीट में एक ऐसी बात लिखी जिसका इशारा नीतीश कुमार की तरफ़ था। उन्होंने लिखा, बीजेपी को उसका नया एलायंस पार्टनर मुबारक हो। बात का बतंगड़ बनने के पहले ही लालू ने बात बदल दी। उन्होंने कहा बीजेपी के पार्टनर माने आयकर विभाग और सीबीआई।

लालू ने एक तीर से दो शिकार कर लिए। वे जो कहना चाहते थे, वह हो गया। उधर नीतीश कुमार ने कहा, बीजेपी जो आरोप लगा रही है, उसमें सच्चाई है तो केंद्र सरकार अपनी एजेंसियों से जांच या कार्रवाई क्यों नहीं कराती? पिछले साल नवंबर में नोटबंदी का नीतीश कुमार ने स्वागत किया था। उसके साथ उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री को बेनामी संपत्ति के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करनी चाहिए। लालू यादव के परिवार की जिस सम्पत्ति को सीबीआई ने छापे डाले हैं, उसका मामला नीतीश की पार्टी ने ही सन 2008 में उठाया था। तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। आज बीजेपी सरकार है और बेनामी सम्पत्ति कानून में बदलाव हो चुका है। लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती और उनके पति इन दिनों सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के घेरे में हैं।

Friday, July 14, 2017

‘मोदी संस्कृति’ को चुनौती हैं गोपाल कृष्ण गांधी

प्रशासक, विचारक, लेखक और आंशिक रूप से राजनेता गोपाल कृष्ण गांधी की देश की गंगा-जमुनी संस्कृति के पक्षधर के रूप में पहचान है. उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है उनकी विरासत और विचारधारा. उनके पिता देवदास गांधी थे और माँ लक्ष्मी गांधी, जो राजगोपालाचारी की बेटी थीं. दादा महात्मा गांधी और नाना चक्रवर्ती राजगोपालाचारी.
गोपाल कृष्ण गांधी सामाजिक बहुलता के पुजारी हैं, और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकसित हो रहे राजनीतिक हिन्दुत्व के मुखर विरोधी. विपक्षी दलों ने उन्हें उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुनकर यह बताने की कोशिश की है कि भारत जिस सांस्कृतिक चौराहे पर खड़ा है, उसमें वे वैचारिक विकल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं. वे मोदी के सामने सांस्कृतिक चुनौती के रूप में खड़े हैं. 

Sunday, July 9, 2017

विपक्षी एकता की निर्णायक घड़ी

सीबीआई लालू ने यादव के परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके शुक्रवार को देशभर में 12 स्थानों पर छापामारी की है। लालू परिवार पिछले कुछ महीनों से सीबीआई के अलावा इनकम टैक्स विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की निगाहों में है। इस गतिविधि के आपराधिक निहितार्थ एक तरफ हैं और राजनीतिक निहितार्थ दूसरी तरफ। इसका फौरी असर बिहार के महागठबंधन पर पड़ने का अंदेशा है। पर इससे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रभाव 2019 के चुनाव को लेकर चल रहे विपक्षी-एकता के प्रयासों पर पड़ेगा।

दूसरी ओर एनडीए की रणनीति भी इन छापों से जुड़ी है। इस छापामारी ने महागठबंधन की राजनीति के अंतर्विरोधों को खोला है। महागठबंधन में सेंध लगाने की एनडीए-राजनीति कितनी सफल होगी, इसका भी इंतजार है। फिलहाल सारी निगाहें नीतीश कुमार पर हैं। उनका नजरिया इन सभी बातों को प्रभावित करेगा।

पिछले दो-तीन हफ्ते में नीतीश कुमार ने अचानक कुछ अप्रत्याशित फैसले किए हैं। राष्ट्रपति पद के चुनाव में विपक्षी एकता से अलग होकर उन्होंने पहला झटका दिया और अपने दृष्टिकोण में आए बदलाव का संकेत भी दिया। उसके बाद उन्होंने कांग्रेस की बुनियादी समझ पर प्रहार किए। फिर भी उन्होंने खुद को व्यापक स्तर पर विपक्षी-एकता से अलग नहीं किया।

Friday, July 7, 2017

भारतीय भाषाओं को लड़ाने की कोशिश

बंगाल में जड़ें जमाने की कोशिश में भारतीय जनता पार्टी साम्प्रदायिक सवालों को उठा रही है. उसके लिए परिस्थितियाँ अच्छी हैं, क्योंकि ममता बनर्जी ने इस किस्म की राजनीति के दूसरे छोर पर कब्जा कर रखा है. भावनाओं की खेती के अर्थशास्त्र को समझना है तो वोट की राजनीति पढ़ना चाहिए. ऐसी ही खेती का जरिया भाषाएं हैं. कर्नाटक में अगले साल चुनाव होने वाले हैं. उसके पहले वहाँ भाषा को लेकर एक अभियान शुरू हुआ है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस तीन भाषा सूत्र की समर्थक है, पर बेंगलुरु मेट्रो में हिंदी विरोध की वह समर्थक है. साम्प्रदायिक राजनीति का यह एक और रूप है, इसमें सम्प्रदाय की जगह भाषा ले लेती है. भाषा सामूहिक पहचान से जुड़ी है. इस आंदोलन के पीछे अंग्रेजी-परस्त लोग भी शामिल हैं, क्योंकि अंग्रेजी उन्हें 'साहब' की पहचान देने में मददगार है.
इन दिनों बेंगलुरु मेट्रो के सूचना-पटों में अंग्रेजी और कन्नड़ के साथ हिंदी के प्रयोग को लेकर एक आंदोलन चलाया जा रहा है. इस आंदोलन को अंग्रेजी मीडिया ने हवा भी दी है. शहर के कुछ मेट्रो स्टेशनों में हिंदी में लिखे नाम ढक दिए गए हैं. ऐसा ही एक आंदोलन कुछ समय पहले दक्षिण भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों के नाम-पटों में हिंदी को शामिल करने के विरोध में खड़ा हुआ था. हाल में राम गुहा और शशि थरूर जैसे लोगों ने बेंगलुरु मेट्रो-प्रसंग में हिंदी थोपे जाने का विरोध किया है. एक तरह से यह भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाने की कोशिश है. साथ ही अंग्रेजी के ध्वस्त होते किले को बचाने का प्रयास भी.

Thursday, July 6, 2017

डगमग होती विपक्षी एकता

बुधवार को मीरा कुमार ने औपचारिक रूप से पर्चा दाखिल करने के बाद अपने प्रचार-अभियान की शुरूआत कर दी है. उनका कहना है कि यह सिद्धांत की लड़ाई है. संविधान की रक्षा के लिए और देश को साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ में जाने से रोकने के लिए वे खड़ी हुई हैं. वस्तुतः यह सन 2019 के चुनाव में गैर-बीजेपी गठजोड़ का प्रस्थान बिंदु है. देशभर में असहिष्णुता और अल्पसंख्यकों की हत्याओं के खिलाफ आंदोलन खड़ा हो गया है. यह उस राजनीति का पहला अध्याय है, जो राष्ट्रीय स्तर पर उभरेगी.
मीरा कुमार के नामांकन के वक्त 17 दलों के प्रतिनिधि उपस्थित थे. इनके नाम हैं कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद, वाममोर्चा के चार दल, तृणमूल कांग्रेस, राकांपा, नेशनल कांफ्रेंस, डीएमके, झामुमो, जेडीएस, एआईयूडीएफ, केरल कांग्रेस, मुस्लिम लीग. आम आदमी पार्टी इस प्रक्रिया में शामिल नहीं थी, पर वह भी मीरा कुमार के साथ जाएगी. यह प्रभावशाली संख्या है, पर इसके मुख्य सूत्रधार कांग्रेस और वामदल हैं. धर्म-निरपेक्ष राजनीति का काफी बड़ा हिस्सा इस राजनीति से बाहर है.

Wednesday, July 5, 2017

गांधी का लेख 'यहूदी लोग'


इस बात को लेकर बहस चल निकली है कि गांधी ने इस्रायल का समर्थन किया था या नहीं। सन 1938 के उनके इस लेख से इतना जरूर पता लगता है कि वे चाहते थे कि यहूदी लोग बंदूक के जोर पर इस्रायल बनाने के बजाय अरबों की सहमति से अपने वतन वापस आएं। व्यावहारिक सच यह भी है कि इस लेख के लिखे जाने के कुछ साल बाद वे धर्म के आधार पर बने पाकिस्तान को रोक नहीं पाए। नीचे मैंने इस लेख का अंग्रेजी प्रारूप भी दिया है। गांधी समग्र के खंड 68 में यह लेख हिंदी में पढ़ा जा सकता है। 

Monday, July 3, 2017

प्रणब के प्रति मोदी की कृतज्ञता क्या कहती है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पिता-तुल्य बताना पहली नजर में सामान्य औपचारिकता लगती है. प्रणब दा के विदा होने की बेला है. ऐसे में औपचारिक बातें ही होती हैं. पर दूसरी नजर में दोनों नेताओं का एक दूसरे की तारीफ करना कुछ बातों की याद दिला देता है.  

रविवार के राष्ट्रपति भवन में एक पुस्तक के विमोचन समारोह में नरेंद्र मोदी ने कहा, जब मैं दिल्ली आया, तो मुझे गाइड करने के लिए मेरे पास प्रणब दा मौजूद थे. मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि मुझे प्रणब दा की उँगली पकड़ कर दिल्ली की जिंदगी में खुद को स्थापित करने का मौका मिला.

Sunday, July 2, 2017

जीएसटी के समर्थन-विरोध का ‘तमाशा’


कांग्रेस पार्टी जीएसटी को लेकर संविधान संशोधन लेकर कभी आई नहीं, पर सच यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी या गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने जीएसटी के विरोध में स्वर उठाए थे। उनका कहना था कि जीएसटी की संरचना ऐसी है कि बिना आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए यह लागू नहीं हो सकता। यह भी सच है कि जीएसटी की परिकल्पना सन 1999 में अटल बिहारी सरकार ने की थी। सन 2003 में केलकर समिति उसने ही बनाई थी। बाद में यूपीए सरकार ने सन 2010 तक उसे लागू करने का बीड़ा उठाया, पर जीएसटी कमेटी से असीम दासगुप्त के इस्तीफे के बाद वह काम रुक गया। मार्च 2011 में एक संविधान संशोधन पेश किया गया, जिसपर आगे विचार नहीं हुआ।

एनडीए सरकार ने जब इस काम को शुरू किया तो कांग्रेस ने ना-नुकुर करना शुरू कर दिया। इससे क्या निष्कर्ष निकाला जाए? यही कि व्यावहारिक-राजनीति तमाम ऐसे कार्यों में अड़ंगा लगाती है, जो सामान्य हित से जुड़े होते हैं। एनडीए को इस संविधान संशोधन को पास कराने और लागू कराने का श्रेय जाता है। इसके लिए कांग्रेस तथा दूसरे दलों को मनाने का श्रेय भी उसे जाता है। जीएसटी कौंसिल के रूप में एक संघीय व्यवस्था कायम करने का भी।

जीएसटी अभी लागू होना चाहिए था या नहीं? उसके लिए पर्याप्त तैयारी है या नहीं? क्या इसबार भी नोटबंदी जैसी अफरा-तफरी होगी? ऐसे तमाम सवाल हवा में हैं। जो लोग इस वक्त यह सवाल कर रहे हैं उन्हें पिछले साल 16 सितम्बर को संसद से संविधान संशोधन पास होते वक्त यह सवाल करना चाहिए था। संविधान संशोधन के अनुसार एक साल के भीतर जीएसटी को लागू होना है। यानी 16 सितम्बर तक उसे लागू करना ही है। अब इस सवाल को बीजेपी या कांग्रेस के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। देश के नागरिक होने के नाते हमें उस प्रवृत्ति को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए, जिसे बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने मौका आने पर अपनाया है। इस वक्त भी तमाशा हुआ है तो दोनों और से हुआ है।  

कांग्रेस को जीएसटी समारोह पर आपत्ति है। पर समारोह हो ही गया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। जब संविधान संशोधन पास कराने में उसकी भूमिका थी, तो इस समारोह के वक्त वह भी इस सहयोग का श्रेय ले सकती थी। अंततः यह कानून भारत का है, बीजेपी का नहीं। इस मामले को देश की स्वतंत्रता से जोड़ने की कोशिश निहायत बचकाना है। देश को आजादी एक वृहत आंदोलन और बदलती ऐतिहासिक स्थितियों के कारण मिली है। कांग्रेस के भीतर भी कई प्रकार की धारणाएं थीं। वही कांग्रेस आज नहीं है। सन 1969 के बाद कांग्रेस बुनियादी रूप से बदल चुकी है। देश के राजनीतिक दलों के स्वरूप और भूमिका को लेकर यहाँ बहस करने का कोई मतलब नहीं है। इस वक्त जो सरकार है, वह देश की प्रतिनिधि सरकार है। जीएसटी कानून एक सांविधानिक प्रक्रिया से गुजर कर आया है। बेहतर हो कि संसद के भीतर और बाहर उसे लेकर बहस करें।